Ram-Katha ki Sarbhaumikta (राम-कथा की सार्वभौमिकता)

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पौराणिक-इतिहास में तीन राम अति प्रसिद्ध हैं- (१) जदग्नि ऋषि के पुत्र परशुराम (२) राजा दशरथ के पुत्र राम (३) कृष्णा के बड़े भाई बलराम! अतः यह कहा गया है की- रामो रामक्ष रामक्ष!

राजा दशरथ के पुत्र की कथा को लिखने का आधार वाल्मीकि ऋषि की रामायण के अतिरिक्त क्या हो सकता है?

वाल्मीकि एक उदभट विद्वान्, अनन्य भक्त तथा गंभीर दार्शनिक हैं! वे राम-विग्रह को अपनी लेखनी रूपी तूलिका से चित्रित कर, काव्यमयी भाषा में राम का मनोगत चित्र इस पदावली में उतारते हैं- “विग्रहवान धर्म श्री राम” – जो मानवीय चरित्र की पवित्रतम मूर्ति थे और जिन सर्वशक्तिमान ने भक्ति एवं निःस्वार्थ भगवत सेवा के अवतार श्री आंजनये को गूढ़ भाषा में हमारे उच्चतम दार्शनिक ज्ञान का सार बताने की कृपा की! राम के धर्म-विग्रह का यह एक रूप है, उनकी धर्म-मूर्ति का इक रूप मानवीय भी है! राम स्वयं स्वीकार करते हैं कि अपनी त्रुटियों के कारन केवल एक मनुष्य हैं! रामायण के राम नायक हैं! उस विशाल नाटक के कई भागों में उनको अभिनय करना पड़ता है! बचपन से लेकर इस संसार से विदा होने तक उनका धर्म मूर्ति स्वरुप हो सामने आता है!

एहि एक मुख्य कारन है कि आज तक वे जान-मानस के एक आदर्श हैं! जनता आज भी बड़े चाव से अपने संतति का नामकरण राम व उनके प्रियों के आधार पर करती है! न केवल भारत में परन्तु विदेशों में भी राम की महिमा अनेक रूपों में आज भी विधमान है! अनेक देशी व विदेशी भाषाओँ में राम-कथा का वर्णन देखने को मिलता है! चित्रकला, काव्य, नाटकों व साहित्यों में राम-कथा की व्यापकता को देखा जा सकता है! जान-गीतों में भी आज तक राम-कथा के स्वर सुने जा सकते हैं! राम-कथा के नाटकीय तत्वों के कारन बालक से वृद्ध तक, अनपढ़ से महापंडित तक, आस्तिक से नास्तिक तक, सभी को रामचरित्र अनादिकाल से परम प्रिये होता आ रहा है और अनंत काल तक परम प्रिय होता रहेगा! भारतीय साहित्य और संस्कृति को वाल्मीकि रामायण ने प्रेरित किया है और संस्कृत साहित्य तो रामायण का चिर ऋणी है! राम-कथा का आनंद शाश्वत और सनातन है और उस आनन्दमयता का रहस्य उसकी तारतम्यता में रही है!

रामायण की कथा वास्तु-
नाटकीय कथा में दो भागों की आवश्यकता होती है- (१) आधिकारिक कथा वास्तु और (२) प्रासंगिकता कतह वास्तु!

‘आधिकारिक कथा वास्तु’ मुख्य होती है क्योकि वह नायक के जीवन प्रवाह से साक्षात सम्बन्ध रखती है, ‘प्रासंगिक कथा वास्तु’ गौण होती है क्योकि वह सामान्य जन से सम्बन्ध रखती है! महर्षि वाल्मीकि ने राम की जीवन कथा आधिकारिक वास्तु के रूप में वर्णित की है तथा उसकी अधिक रोचकता बढ़ाने के लिए उसमें बलि-सुग्रीव की कथा, श्रमराण-शबरी की कथा, श्रवण कुमार की कथा, रावण-कुम्भकरणादि राक्षसों, जनक-परशुराम, हनुमान, अगस्त्य, वसिष्ठ, जटायु, आदि अनेकों के कथाव्रत प्रका-प्रकरी के स्वरूप में आधिकारिक राम-कथा की मनोहरता शत्गृनित करते हैं!

ऐसे ही अन्य कथाकारों ने स्वरुप और रूचि के अनुसार कई नई घटनाएं व प्रक्षेप मूल कथा में जोड़े हैं जो मूल कथा को कुछ के लिए रोचक और कुछ के लिए धूमिल व भ्रामक बनाते हैं!

कुछ पाश्चात्य व भारतीय विद्वान रामायण के पत्रों को ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं मानते अतः रामायण को सच्चा इतिहास न मानकर अन्य पौराणिक गाथाओं के सदृश्य एक उच्च निति-प्रबोधक गाथा मानते हैं! लेकिन उनके मत में पूर्ण सच्चाई नहीं है, रामायण और उसके पात्र ऐतिहासिक हैं! उपनिषद की “इतिह+आस” व्याख्या के अनुसार अथवा ‘इति-ह-ुंचुवृंदा’ (प्रमाणिकां) अर्थात प्रमाणिक वृंद परम्परा से इसी प्रकार सुनते-कहते चले आए हैं!

आदर्श व्यक्ती तो प्राचीन समय से भारत में मिलते रहे हैं लेकिन वाल्मीकि के समय में राजघराने में ऐसा प्रबोधक कुटुंब नहीं मिलता, अतः वाल्मीकि ने संसारी जनों के हिताय- सर्वजन हिताय, सर्वजन प्रबोधाय रामायण रचा जिसमें आदर्श स्त्री, आदर्श पति, आदर्श बंधू, आदर्श माता, आदर्श पिता, आदर्श राजा, आदर्श राज्य व्यवस्था और आदर्श प्रजापाल की बन संसार के सम्मुख राखी और ऐसी विचित्रता राखी कि रामायण को बार-बार पढ़ना और सुन्ना अच्छा लगता है!

इन सभी विषयों को ऐतिहासिक व मान्यता के आधारों पर इस पुस्तक में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है!

राम अवतार शर्मा राजनीती विज्ञान और भारतीय इतिहास के ज्ञाता है! आपकी इन विषयों के विभिन्न पहलुओं एवं समसामजिक विषयों पर अनेक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है! आप दिल्ली विश्विद्यालय के महाराजा अग्रसेन कॉलेज के संस्थापक प्राचार्य रहे है! आजकल आप गहन शोध कार्य में व्यस्त हैं! आपकी अन्य पुस्तकें हैं – राष्ट्रवाद, त्याग एवं बलिदान; भारतीय राज्य: उत्पत्ति एवं विकास; जल: कल, आज और कल तथा दिल्ली: बियोग्राफी ऑफ़ ए सिटी!

Additional information

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Pages

312

ISBN

Language

Hindi

Format

Hardbound

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